4.2.15

पटरी, होलिका दहन, मौसम, बिटिया, ना जाने क्या बात हुई : कवि विदुषी जी हैं.. कविताओं पर टिप्पणी हमारे साथी डॉ.शशांक शुक्ला जी ने की है..

पटरी

मैं खड़ी थी जहाँ
मेरे पैरों के नीचे की मिट्टी मेंथे
कंकर पत्थर और काँच के टुकड़े
जो चुभते मैं दुखी हो जाती
बैठ जाती वहीं
देखती रहती अपने लहूलुहान पैरों को
एक दिन मुझे लकड़ी की एक पटरी मिली
मैं खड़ी हो गई उस पर
मिट्टी को छानकर
अलग कर लिए कंकर पत्थरऔर काँच के टुकड़े
कंकरों से मैने एक मन्दिर बना लिया
पत्थर को मूर्ति बना प्रतिष्ठित कर दिया
काँच के रंगीन टुकड़ों से अल्पनाएं बना लीं
अब मेरे पैरों के नीचे की मिट्टी मुलायम है
बहुत खुश हूँ मैं
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होलिका दहन

अनाचार की होलिका
भले ही पहने हो
संरक्षित वस्त्र
जलाने जाएगी जब
विश्वास के नन्हें प्रहलाद को
तो सच मानो
जलेगी वह स्वयं
अक्षत बचेगा विश्वास
तो आओ
इस होलिका दहन में
तपाएं आस्था जौं
नई फ़सल के
फूटने दें उल्लास
झूम उठे लयबद्ध
लोकमन

मौसम

दिन भर सजा के बाद
मौसम के मास्टरजी ने
दे दी है छुट्टी
देखो..
हवा की शैतान बच्ची
कन्धे पर चढ़ गई है
नीम दादू के
तभी तो
झुका जा रहा है वो

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बिटिया

मेरे मन में उतर आती ह
पहाड़ों से उतरती
उछलती
पत्थरों से इक्कल दुक्कल खेलती
एक अल्हड़ नदी
जो लगा लेती है अपने माथे पर
लाल बिंदिया
ओढ़ लेती है चुनरी सुनहरी
कभी सजा लेती है चाँदी का बोड़ला
और बालों में मोती की लड़ियाँ
मेरे भी अधरों पर
खिल उठते हैं फूल
दुपहरिया के
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ना जाने क्या बात हुई

बदले रंग फ़िज़ाएं बदलीं बिन मौसम बरसात हुई
भरी दोपहरी गोधूली है ना जाने क्या बात हुई
पकते बौर झूमते अमुवा मस्त मल्हारें कहाँ गईं
गंगा वैसे ही बहती है पर होली की आँच गई
नानी का चौबारा छूटा बस की आपाधापी में
छत पर लेटें किस्सों वाली खत्म सुहानी रात हुई
मिलते थे हम रोज सखा रे गलबहियों के हारों संग
मिट्टी नरम घरौंदों वाली लील कौन बरसात गई
गिट्टू पौटिक्का पोशम्पा गुल्ली डंडा भूल गए
टीवी सीडी इन्टरनैट ही बचपन की सौगात हुई
पाती के दिन कहाँ गए अब फोन हमेशा खड़के है
सम्बन्धों की निश्छलता तो अब अतीत की बात हुई

टिप्पणी                                                                        

पटरी,होलिका दहन ,मौसम ,बिटिया और न जाने क्या बात हुई...सभी छोटी कवितायेँ हैं।छोटी कविताओं की ख़ूबी उसकी भाषा मितव्ययता तो होती ही है इसके अतिरिक्त वह संवेदना के प्रभाव को पकड़ने का कार्य भी लम्बी कविताओं के मुकाबले ज्यादा बेहतर करती हैं। बड़ी कविताओं में व्यौरे-इतिवृत्त के माध्यम से संवेदना तक कवि पहुँचता है तो छोटी कविता में संवेदना तक कवि प्राय:सीधे ही पहुँचना चाहता है ।आलोच्य कविताओं में कवि/कवयित्री ने जीवन के उल्लास को अन्दर से पकड़ने का अच्छा प्रयास किया है ।होलिका दहन ,मौसम और बिटिया जैसी कविताएँ मन-संवेदना के मूल तंतुओं को बख़ूबी पकड़ती हैं। इन कविताओं में प्रकृति-मनुष्य की गति को एक-दूसरे के सापेक्ष में रखा गया है। न जाने क्या बात हुई कविता जीवन की विसंगति को पकड़ती है तो 'पटरी' कविता जीवन बोध को ...इस दृष्टि से यह कविता मुझे विशेष प्रिय लगी। अब बात कविताओं पर -

पटरी

'पटरी' कविता विवेक की छलनी में आस्था को तार्किक रुप दे देने का कौशल विकसित कर देना है ।यहाँ मिट्टी समाज के रुपक में ढल गया है।कांकर-पाथर ब़ेगढ़ संवेदना /आस्था में ।भावों के अनगढ़पन को ठोस आस्था और विवेक में ढाल कर सृजनात्मक रुप दे दिया गया है ।
जब तक हमारी भावनाएं-संवेदनाएँ कच्चे रुप में होती हैं ,तब तक हम लहुलुहान ही होते रहते हैं...भावनाओं की कच्चाई हमारे स्थिर जीवन का ही प्रतिफल है ।हमें जो मिला है , उसके साथ जीना जड़ता नहीं तो और क्या है ? कंकड़ को मंदिर ,पत्थर को मूर्ति तथा कांच को अल्पना में ढाल देना  'विवेक का सृजन ' है ।यहाँ कविता कबीर के विद्रोही तेवर से अलग सृजन-पथ पर चली जाती है। वास्तविक रुप में ख़ुशी- आनन्द हमारे कर्मों का सृजनात्मक हो उठना ही है ।इस दृष्टि से यह कविता अपनी प्रभावान्विति में सफल है ।

होलिका दहन

'होलिका दहन' कविता विश्वास के बच निकलने की थीम पर आधारित है ।होलिका-दहन के पौराणिक - वृत्त को लेकर यह कविता चलती है....होलिका यहाँ असत् के जल जाने और सत् के निखर उठने के प्रतीक रुप में आई है। लेकिन होलिका दहन में आस्था का तपना , नई फ़सल के कोंपल रुपी उमंग में लोकमन के उल्लास का रुपक भी निर्मित हुआ है ।अनाचार की होलिका पर विश्वास की विजय के मिथ को लोक की स्वीकृति की कविता ही 'होलिका दहन' है ।

मौसम

'मौसम' कविता केदारनाथ अग्रवाल के 'बासंती हवा ' कविता का स्मरण कराती है ।मौसम मास्टरजी में , हवा शैतान बच्ची में रूपांतरित हो गई है...नीम का झुक जाना वस्तुत: प्रकृति की उमंग का परिचायक भी है और व्यक्ति मन के साथ प्रकृति के तादात्म्य और साहचर्य का भी...... कविता अपेक्षाकृत छोटी है...बिम्ब अधूरे लगते हैं अत: कविता अधूरे रूप में हमारे सामने आती है ।कुछ और चित्र कविता को संभवत: ज्यादा प्रभावी बनाते ....

बिटिया

'बिटिया' कविता में प्रकृति और मानव गति के बीच साहचर्य को सुन्दर ढंग से पकड़ा गया है ।मन से भावों का उतर जाना ...पहाड़ के बीच से नदी का निकल जाना है। समाज- सभ्यता की जटिलता , कृत्रिम ऊँचाई के बीच जो तरलता है...उमंग है ,वह जीवन है ।इस कविता में बिटिया नदी में रूपांतरित होती है...फ़िर जीवन में और फ़िर 'खिल उठते हैं फूल दुपहरिया के ' के माध्यम से प्रकृति और मानव-सम्भावना के तादात्म्य को खोजा गया है। पूरी कविता बिम्बों के संगीत से रची गयी है....प्रकृति अनुभूति में और अनुभूति प्रकृति की जीवंतता में ढल  गई है। यह छोटी कविता है किन्तु बिटिया रुपी मानव-सम्बन्ध को संगीतात्मक रवानगी से जीवंत किया गया है ।

न जाने क्या बात हुई ।

इस कविता में बिन मौसम बरसात ,दोपहरी गोधूली जैसे विभावनात्मक- विसंगतिपूर्ण भाषा प्रयोग से जीवन की विसंगति के चित्र खींचे गये हैं ।प्रारंभ में कविता में आशा के दृश्य रखे गये हैं किन्तु क्रमश: कविता जीवन के यथार्थ पर खड़ी हो गयी है ।कविता मल्हार ,होली की आँच , नानी के चौबारे के छूट जाने के माध्यम से समाज के रीतेपन का अच्छा चित्र खींचती है ।क़िस्सों का ख़त्म हो जाना कहीं हमारे जीवन में "स्मृति लोप " का हो जाना तो नहीं है ? इतिहास- जीवन सम्बन्ध को बांधने वाले क़िस्से की समाप्ति हमारे अतीत-भाव का चूक जाना भी है ।'संबंधों की निश्छलता को अतीत' कहना इसी प्रकार की स्वीकारोक्ति है। बचपना पूँजी में खोता जा रहा है.... ।सभ्यता -विस्तार के क्रम में मनुष्य के भाव -प्राकट्य के तौर-तरीके भी बदले हैं और उनमें आंतरिक संघर्ष भी बढ़ा है ....अंत:करण पर बाह्य दबाव क्रमश: बढ़ता ही गया है और उसी अनुपात में संवेदनाओं का क्षरण भी....यह कविता 'न जाने क्या बात हुई ' के प्रश्न सूचक संकेत के माध्यम से हमारा ध्यान इसी ओर खींचती है

कवि विदुषी जी हैं.. कविताओं पर टिप्पणी हमारे साथी डॉ.शशांक शुक्ला जी ने की है..दोनों साथियो का बहुत-बहुत आभार...

12.01.2015

हाँ! मैं इस दुनिया का/ सबसे नाकाम प्रेमी हूँ! : अमृत सागर

1. हाँ!  मैं इस दुनिया का/ सबसे नाकाम प्रेमी हूँ!
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जो अंत तक
नहीं कर सका/ तुम्हारे दोनों हाथों में अंतर!
और न ही/ पार कर सका/ तुम्हारे आँखों का समंदर!

क्योंकि तुम्हारी आँखें/ मुझे हमेशा
किसी कराहते कांच सी लगीं
जिन्हें किसी नरम दिल में/ बेवजह
धंसने और विलगने की प्रक्रिया से
गुजार दिया गया था!

असल में/ मुझे तुममें/ प्रेमिका कम
मां ज्यादा नजर आती रही!

शायद/ तभी मैं
तुम्हारे चले जाने के बाद भी
तुम्हे खोना नहीं चाहता!

मैंने हर उस याद को/ भींच रखा है!
जो मेरी स्मृतियों में ठहर सकी

शायद! इसलिए ही मैंने
तुम्हारे आने से पहले/ और जाने के बाद तक
तुम्हारा इन्तजार किया!

यह मेरी नाकामी है/ कि मैंने तुम्हे
हवा नहीं नदी समझा!

और भूल गया
कि जब भी हवा पहाड़ों से टकराती है
बारिशें होती है!

जिसे अक्सर/ नदियों में ही मिल जाना होता है!
पर उसे पहाड़ कभी साबित नहीं कर पाता!

आखिर में बचता है/ एक नाकाम प्रेमी!
और उसकी स्मृतियों में उसकी प्रेमिका!


जो चेहरे से बिलकुल मेरी मां जैसी है!
पर आदतों में मुझ सी!

◽अमृत सागर

2. कवि की रसोई      
(is kavita ke kavi ka nam mere pas uplabdh nahi hai.)                                                              

ज़रा आराम से बाहर बैठो
मेरे प्‍यारे श्रोता-पाठक
इधर मत तांको-झांको
आनंद लो खुश्‍बुओं का
आने वाले जायके का
मेरी कविता की कड़वाहट का

कुछ हासिल नहीं होगा तुम्‍हें
इधर आकर देखने से
बहुत बेतरतीबी है यहां
कोई चीज़ ठिकाने पर नहीं

सुना आज का अखबार पढ़कर
जो डबाडबा आये थे आंसू
उन्‍हें मैंने प्‍याले में जमा कर लिया था

पहले प्रेम के आंसू
बरसों से सिरके वाली बरनी में सुरक्षित हैं
किसानों के आंसुओं की नमी
मेरे लहू में है
भूख-बेरोजगारी से त्रस्‍त
युवाओं की बदहवासी
मेरे भीतर अग्नि-सी धधकती रहती है
जिंदगी के कई इम्‍तहानों में नाकाम
खुदकुशी करने वालों की आहें
मेरी त्‍वचा में है चिकनाई की तरह

विलुप्‍त होते जा रहे
वन्‍यजीवों के रंग मेरी स्‍याही में
जंगल और पहाड़ों के गर्भ में छुपे
खनिजों की गर्मी है मेरी आत्‍मा में
और इन पर जो गड़ाये बैठे हैं नजरें
पूंजी के रक्‍त-पिपासु सौदागर
उन पर मेरी कविता की नज़र है लगातार

अभावग्रस्‍त लोगों की उम्‍मीदों के
अक्षत हैं मेरे कोठार में
हिमशिखरों से बहता मनुष्‍यता का
जल है मेरे पास दूध जैसा
प्रेम की शर्करा है
कभी न खत्‍म होने वाली
दु:ख, दर्द और तकलीफों के मसाले हैं
चुनौतियों का सिलबट्टा है
कड़छुल जैसी कलम है
हौंसलों के मर्तबान हैं
कामनाओं का खमीर है मेरे पास

अब बताओ
तुम क्‍या पसंद करोगे ?


10.01.2015


सत्यनारायण पटेल : कुछ साथियो की रचनाएँ...हमें वरिष्ठ साथियो की रचनाओं की तुलना में कच्ची-पक्की भी लग सकती है...

मित्रो समूह में कुछ साथी युवा है...कुछ साथियो की रचनाएँ...हमें वरिष्ठ साथियो की रचनाओं की तुलना में कच्ची-पक्की भी लग सकती है...लेकिन जैसी भी हो..हमारे साथियो की रचनाएँ होंगी...उन पर हम खुलकर बात करेंगे...उन्हें जो सुझाव दिया जा सकना संभव होगा...देंगे...किसी भी विधा की परिपक्व रचना पर वैसे भी ज्यादा बोलने की गुंजाइश न रहती...लेकिन युवा साथियो की रचना पर बात करने की भरपूर संभावनाएँ...रहती है...मैं जिन भी साथियो को टिप्पणी के लिए रचनाएँ भेजूंगा..उनसे मेरी केवल एक ही गुजारिश होगी कि..वे एक बेहतर कुम्हार की भूमिका का निर्वहन करने की
कोशिश करे.....

09.01.2015